मैंने पिछले तीन साल गुजराती सिनेमा को करीब से देखते हुए बिताए हैं। और एक बात जो मुझे बार-बार चौंकाती है वो यह है — गुजराती दर्शक किसी भी दूसरे रीजनल सिनेमा के दर्शक से ज़्यादा चालाकी में यकीन रखता है। वो हीरो को तलवार चलाते नहीं देखना चाहता। वो देखना चाहता है कि हीरो ने कैसे बिना तलवार उठाए दुश्मन को मात दी।

यही वजह है कि बेहरूपिया — यानी वो किरदार जो हर बार नया रूप धारण करता है — गुजराती सिनेमा और नाटक का सबसे प्रिय archetype बन गया है।

"गुजराती सिनेमा में असली नायक वो नहीं जो सबसे ऊँचा मारता है — वो है जो सबसे चालाकी से बचकर निकलता है।"

बेहरूपिया की परंपरा सदियों पुरानी है। नवरात्रि के दिनों में गाँव-गाँव घूमने वाले वो कलाकार जो एक दिन साधु बनते, दूसरे दिन सिपाही, तीसरे दिन व्यापारी — यही गुजरात की सांस्कृतिक विरासत का एक अनमोल हिस्सा है। आधुनिक गुजराती सिनेमा ने इस किरदार को पर्दे पर उतारा और कैसे उतारा।

Chor Chor से Blackmail तक — किरदारों का खेल

Chor Chor देखिए — एक आदमी जो चोर बनने का नाटक करता है ताकि असली चोर को पकड़ा जा सके। Jholachhap में एक छोटे शहर का जुगाड़ू लड़का, जो हर बार नई चाल चलता है और हर बार किसी नए रूप में सामने आता है। Blackmail में तो बेहरूपिया का खेल इतना layered है कि आप खुद तय नहीं कर पाते — धोखेबाज़ कौन है और असली victim कौन।

यह सिर्फ कॉमेडी नहीं है। यह गुजराती दर्शक की बौद्धिक भूख को satisfy करने का तरीका है। जब Malhar Thakar Chidibaaz में एक ग्रामीण लड़के का किरदार निभाते हैं जो छोटे-छोटे झूठों से पूरे गाँव को घुमाता रहता है, तो हँसी के साथ-साथ एक असहज सच्चाई भी सामने आती है — हम सब कभी न कभी किसी न किसी के बेहरूपिए होते हैं।

Honeytrap — जब थ्रिलर में घुसा बेहरूपिया

गुजराती सिनेमा का एक और आयाम है जिसके बारे में कम बात होती है — crime thriller। Honeytrap इस genre में बेहरूपिया की concept को बिल्कुल नए तरीके से इस्तेमाल करती है। यहाँ रूप बदलना सिर्फ हँसाने के लिए नहीं, बल्कि survive करने के लिए ज़रूरी है। यह tension ही इस फिल्म को यादगार बनाती है।